
वसीम खान मऊ रिपोर्टर
करहाँ :मुहम्मदाबाद गोहना : मऊ जनपद के जाने माने हस्ती व जामा मस्जिद के इमाम मौलाना लियाकत अली का अचानक बुधवार की रात्रि 1बजे इंतकाल हो गया। वे कई दिनों से बीमार चल रहे थे। हज़ारो लोग उनकी आखिरी जियारत के लिए स्थानीय तहसील क्षेत्र के माहपुर पैतृक आवास पर पहुंचे और शमीम मेमोरियल पब्लिक स्कूल के मैदान में स्थित मस्जिद के सामने मैदान में नमाज-ए-जनाजा अदा की गयी जिसमें हज़ारो लोग शरीक हुए। हर कोई उनके जनाजे को कंधा देने के लिए परेशान था। विधायक राजेंद्र कुमार, महेंद्र यादव, रवींद्र यादव,श्याम बिहारी जायसवाल, शहंशाह सौदागर समेत कई इस्लामिक और राजनैतिक हस्तियां शरीक हुईं। 75 वर्षीय इमाम मौलाना लियाकत अली की मौत की खबर जैसे ही क्षेत्र में पहुंचा तो मातम छा गया। भारी भीड़ को देखते हुए उनके जनाजे को लोगों की जियारत कराने के लिए मस्जिद के सामने मैदान ले जाया गया।नमाज अदा करने के बाद उनके जनाजे को सुपुर्द ए खाक करने के लिए माहपुर स्थित कब्रिस्तान ले जाया गया। जहाँ पर हज़ारों लोगों ने नम आंखों से उनके जनाजे को सुपुर्द ए खाक किया। इमाम मौलाना लियाकत अली साहब की बचपन से ही दीनी तालीम में दिलचस्पी थी। वे कई वर्षों तक जामा मस्जिद के इमाम थे मदरसा हिदायतुल इस्लाम के संस्थापक थे । मदरसा हिदायतुल इस्लाम को आगे बढ़ाया और अपनी मेहनत से मदरसे को ऐसा संजो दिया कि उसमें हर साल कई बच्चे हाफिज बनते हैं। वे हिंदू मुस्लिमों में अत्यंत लोकप्रिय थे। उन्होंने अपना जीवन बेहद सादगी के साथ बिताया। लोगों को आडंबरों से बचने की नसीहत दिया करते थे।उनकी ख्याति इस प्रकार फैली थी कि वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे और दूर दूर से दोनों वर्गों के लोग उनके पास दुआ कराने के लिए पहुंचते थे और सभी को बराबर का सम्मान दिया जाता था।
वह कभी किसी से भेदभाव नहीं रखते थे और सभी को अपने अपने धर्मों का पालन करने व इंसानियत की परिभाषा दिया करते थे। वह आडंबरों में विश्वास नहीं रखते थे। वह दोनों वर्गों को एक ही बात कहते थे कि हम सब ऊपर वाले के बंदे है।




