
व्यूरो रिपोर्ट रविशंकर मिश्रा
चंदौली जिले में लगातार दो तीन दिन बारिश होती है, तो गढ़ई नदी सुर्खियों में आ जाती है। बाढ़ के पानी में डूबी फसलें, प्रभावित किसान, गांवों में घुटनों तक पानी और निरीक्षण करते अधिकारी—यह सब अब एक आम दृश्य बन गया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल निरीक्षण और फोटो खिंचवाने से बाढ़ की समस्या का समाधान हो सकता है? जब तक इस गंभीर मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक यह समस्या यूँ ही साल दर साल दोहराई जाती रहेगी।

सन 2002 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और ओम प्रकाश सिंह राज्य के सिंचाई मंत्री थे। उस समय गढ़ई नदी की व्यापक सफाई कराई गई थी, जिससे काफी हद तक बाढ़ की समस्या पर नियंत्रण पाया गया था। लेकिन उसके बाद से आज तक न तो गढ़ई नदी की फिर से सफाई हुई, न ही तटबंधों की मरम्मत की गई। अब स्थिति यह हो गई है कि अगर तीन-चार दिन लगातार बारिश हो जाए, तो गढ़ई नदी का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है और आस-पास के गांवों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

गढ़ई नदी लगभग 52 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से लगभग 26.5 किलोमीटर हिस्सा चंदौली जिले के मुगलसराय तहसील में आता है। यह हिस्सा शिवनाथपुर चोरमरवा गोपालपुर डीहुलिया से शुरू होकर दो मुहवा तक जाता है। यह नदी कभी किसानों की सिंचाई का प्रमुख साधन हुआ करती थी, लेकिन अब यह उनके लिए मुसीबत बन गई है। न तो नदी की गहराई पर्याप्त रह गई है, न चौड़ाई, और ऊपर से अतिक्रमण की समस्या ने जल प्रवाह को और बाधित कर दिया है।

जब बाढ़ आती है, तो हजारों एकड़ फसलें बर्बाद हो जाती हैं। किसानों की मेहनत, लागत और सालभर की कमाई कुछ ही घंटों में पानी में बह जाती है। सरकार द्वारा राहत के नाम पर जो सहायता दी जाती है, वह पर्याप्त नहीं होती और अक्सर समय पर भी नहीं पहुंचती। वहीं दूसरी ओर, विभागीय अधिकारियों द्वारा कागज़ों पर लाखों-करोड़ों रुपए का खर्च दिखा दिया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो स्थायी समाधान होता है और न ही बाढ़ की पुनरावृत्ति रुकती है।

किसानों का कहना है कि अब निरीक्षण और बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ठोस कार्यवाही की आवश्यकता है। गढ़ई नदी की स्थिति को देखते हुए उसके चौड़ीकरण, गहराईकरण और नियमित सफाई की योजना बनाई जानी चाहिए। नदी के प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करने वाले अतिक्रमणों को तत्काल हटाया जाए और जो तटबंध वर्षों से टूटे या क्षतिग्रस्त हैं, उनकी मरम्मत की जाए। जब तक यह काम युद्धस्तर पर नहीं किया जाएगा, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी।

वर्तमान सरकार और सिंचाई मंत्री स्वतंत्र देव सिंह से किसानों ने मांग किया है कि गढ़ई नदी को लेकर एक योजना बनाई जाए। सरकार को इस परियोजना के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित करनी चाहिए, क्योंकि बिना पर्याप्त बजट और संसाधनों के कोई भी कार्य योजना सफल नहीं हो सकती। केवल नाम मात्र की योजनाएं बनाकर या छोटे-छोटे कार्यों को दिखाकर समस्या से छुटकारा नहीं मिलेगा।
इसके अतिरिक्त, एक निगरानी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि आवंटित धनराशि का सही उपयोग हो रहा है और कार्यों की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो। इसमें स्थानीय किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों को भी शामिल किया जा सकता है, ताकि योजनाओं पर पारदर्शिता और जनभागीदारी सुनिश्चित हो सके।

अगर सरकार वास्तव में किसानों की चिंता करती है, तो अब यह समय है कि गढ़ई नदी को लेकर एक ठोस, दीर्घकालिक और व्यापक योजना बनाई जाए। यह योजना केवल कागज़ों पर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देनी चाहिए। बाढ़ राहत की योजनाएं सिर्फ आपदा के बाद की औपचारिकता न बनें, बल्कि उनका उद्देश्य समस्या की जड़ तक पहुंचकर उसका स्थायी समाधान हो।
जब तक गढ़ई नदी की सफाई, चौड़ीकरण, अतिक्रमण हटाने और तटबंधों की मरम्मत जैसे ठोस कार्य नहीं किए जाते, तब तक चंदौली की बाढ़ की समस्या हर साल किसानों को तबाह करती रहेगी। अब वक्त आ गया है कि सरकार और जनप्रतिनिधि इस समस्या को केवल एक राजनीतिक अवसर नहीं, बल्कि मानव और कृषि संकट के रूप में देखें और इसके समाधान में पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ जुटें। क्योंकि केवल निरीक्षण और घोषणा से नहीं, बल्कि ठोस क्रियान्वयन से ही बाढ़ पर काबू पाया जा सकता है।




