
व्यूरो रिपोर्ट रविशंकर मिश्रा
UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) कानून को लेकर यह बहस तेज है कि इसे कुछ लोग “सामान्य वर्ग के छात्रों को मिटाने वाला कानून” क्यों कह रहे हैं। इस तरह की आलोचना मुख्यतः समता (Equity) और समान अवसर (Equal Opportunity) की नई व्याख्या को लेकर सामने आ रही है, जो 2026 के संशोधित नियमों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।
आलोचकों का तर्क है कि नये नियमों में समावेशन (Inclusion) और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के नाम पर संस्थानों पर ऐसी बाध्यताएँ डाली जा रही हैं, जिनसे सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रवेश, छात्रवृत्ति, शोध अवसर और नियुक्तियों में यदि केवल सामाजिक पहचान को प्राथमिक आधार बनाया जाता है, तो योग्यता आधारित प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इसी कारण कुछ लोग इसे “सामान्य वर्ग विरोधी” करार दे रहे हैं, हालांकि समर्थक इसे ऐतिहासिक असमानताओं को संतुलित करने की कोशिश मानते हैं।
समता और समान अवसर सुनिश्चित करने के नाम पर जिन गतिविधियों को भेदभाव की श्रेणी में रखा जा सकता है, उनमें शामिल हैं—
किसी छात्र को उसकी जाति, वर्ग, लिंग, भाषा, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति के आधार पर अवसर से वंचित करना।
प्रवेश, मूल्यांकन या छात्रवृत्ति में पारदर्शिता का अभाव।
किसी विशेष समूह को लगातार लाभ और अन्य को स्वाभाविक रूप से बाहर कर देना।
शिकायत करने वाले छात्र के साथ प्रतिशोधात्मक व्यवहार।
2026 के संशोधित UGC नियमों की एक प्रमुख खासियत यह है कि संस्थानों को सभी शिकायतों और उन पर की गई कार्रवाई का सही, अपडेटेड और दस्तावेज़ी रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्रकार के भेदभाव की शिकायत को दबाया न जाए और उस पर समयबद्ध, निष्पक्ष कार्रवाई हो। हर शिकायत का ट्रैक रिकॉर्ड रखना, जांच की प्रक्रिया दर्ज करना और परिणाम सार्वजनिक या निरीक्षण योग्य बनाना संस्थानों की जवाबदेही बढ़ाता है।
समग्र रूप से देखा जाए तो नया UGC कानून एक तरफ सामाजिक समता को मजबूत करने की कोशिश करता है, वहीं दूसरी ओर यह बहस भी खड़ी करता है कि क्या समता के नाम पर सभी वर्गों के लिए समान अवसर वास्तव में सुनिश्चित हो पा रहे हैं या नहीं। यही कारण है कि यह कानून समर्थन और विरोध—दोनों का केंद्र बना हुआ है।




