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Chandauli news, आरक्षित वन भूमि में खुलेआम शराब का कारोबार! आबकारी विभाग कटघरे में,?

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संवाददाता विनोद यादव

नौगढ़ चन्दौली।
आरक्षित वन भूमि पर बने अवैध मकानों में देशी शराब की सरकारी दुकानों का संचालन होने का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जयमोहनी और मझगांई रेंज क्षेत्र में लंबे समय से चल रही इन दुकानों ने न केवल वन कानूनों की धज्जियां उड़ाईं, बल्कि प्रशासनिक निगरानी तंत्र की पोल भी खोल दी है। मामले को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग ने जिला आबकारी अधिकारी को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
रविवार को मझगांई रेंज में अग्रिम मृदा कार्यों के निरीक्षण के दौरान रेंज अधिकारी अमित श्रीवास्तव की नजर वन क्षेत्र के भीतर संचालित देशी शराब की दुकानों पर पड़ी। प्रथम दृष्टया ही मामला संदिग्ध प्रतीत हुआ। तत्काल दुकानों की जीपीएस लोकेशन ट्रेस कराई गई, जिसमें यह साफ हो गया कि संबंधित शराब दुकानें आरक्षित वन भूमि के भीतर अवैध रूप से संचालित की जा रही हैं।

नोटिस, समय-सीमा और सख्त चेतावनी

वन विभाग द्वारा जारी किए जाने वाले नोटिस में स्पष्ट किया जाएगा कि आरक्षित वन भूमि पर किसी भी प्रकार का व्यावसायिक उपयोग कानूनन अपराध है। संबंधित दुकानों पर नोटिस चस्पा कर संचालन बंद करने के लिए निश्चित समय-सीमा तय की जाएगी।
निर्धारित समय में दुकान बंद नहीं हुई तो लगेगा ताला
यदि तय अवधि के भीतर आबकारी विभाग द्वारा स्वयं शराब दुकानों का संचालन बंद नहीं कराया गया, तो वन विभाग द्वारा मौके पर ताला लगाने की सीधी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही जिन व्यक्तियों ने वन भूमि पर अतिक्रमण कर मकान बनवाए हैं, उनके खिलाफ भी वन अधिनियम के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वन विभाग ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अवैध निर्माण को किसी भी दशा में वैध नहीं माना जाएगा।

आबकारी विभाग और ठेकेदार की भूमिका संदेह के घेरे में

सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना भूमि की वैधता जांचे, बिना वन विभाग से एनओसी लिए और बिना सीमांकन के शराब दुकानों की चौहद्दी कैसे तय कर दी गई? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर मिलीभगत? आबकारी विभाग और शराब ठेकेदार की भूमिका अब सीधे जांच के दायरे में आ गई है।
वन विभाग की बड़ी चूक भी आई सामने
इस पूरे प्रकरण में वन विभाग की वर्षों पुरानी कमजोरी और शिथिल निगरानी व्यवस्था भी उजागर हुई है। आरक्षित वन भूमि पर पहले अतिक्रमण हुआ, फिर मकान बने और बाद में उनमें शराब की दुकानें तक खुल गईं—यह सब रातोंरात नहीं हुआ। ऐसे में सवाल उठता है कि नियमित गश्त, सीमांकन और समय-समय पर निरीक्षण के बावजूद यह अवैध गतिविधि इतने लंबे समय तक कैसे चलती रही?
यदि समय रहते वन भूमि पर हुए अतिक्रमण पर सख्ती दिखाई गई होती, तो आज यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

वन संपदा पर सीधा हमला
वन क्षेत्र में शराब दुकानों का संचालन न केवल पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के खिलाफ है, बल्कि इससे सामाजिक अपराधों को भी बढ़ावा मिलता है। यह मामला स्पष्ट करता है कि यदि प्रशासनिक विभागों के बीच समन्वय और जिम्मेदारी तय नहीं की गई, तो आरक्षित वन भूमि पर ऐसे अवैध कारोबार फलते-फूलते रहेंगे।
अब देखना यह है कि नोटिस की कार्रवाई केवल कागजी साबित होती है या वास्तव में मझगांई रेंज में अवैध शराब दुकानों पर ताला लगाकर वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया जाता है।

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