
वसीम खान मऊ रिपोर्टर
मऊ आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में जहाँ मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल चैट ने इंसानी रिश्तों की गर्माहट कम कर दी है, वहीं मऊ के वलीदपुर का बाज़ार ज़िंदगी की एक अलग तस्वीर पेश करता है। यहाँ हर मोड़ पर अपनापन है, हर मुस्कान में सुकून है और हर शाम ज़िंदगी का असली रंग बिखेर देती है।
बाज़ार की शाम: सुनहरी रौनक
सूरज ढलते ही वलीदपुर के छोटे से बाज़ार की रौनक बढ़ जाती है। ढलती किरणों का सुनहरा रंग दुकानों की छतों पर बिखर जाता है और लोग दिनभर की थकान भूलकर इस चहल-पहल का हिस्सा बनने निकल पड़ते हैं। छोटे-छोटे ठेलों से उठती पकौड़ों की खुशबू, बच्चों की खिलखिलाहट और दुकानदारों की आवाज़ें – सब मिलकर इस बाज़ार को एक जीवंत तस्वीर बना देती हैं।

रिश्तों की गरमाहट
यहाँ सिर्फ सामान की खरीद-बिक्री नहीं होती, बल्कि रिश्तों का आदान-प्रदान भी होता है। दुकानदार अपने ग्राहकों को नाम से पुकारते हैं, हालचाल पूछते हैं और पुराने रिश्तों को आज भी उसी अपनापन से निभाते हैं। यहाँ की शामें हमें यह अहसास कराती हैं कि रिश्ते ‘लाइक’ और ‘शेयर’ से कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं।
ज़िंदगी का असली मज़ा
भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में जहाँ लोग एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं, वहीं वलीदपुर का यह बाज़ार हमें सिखाता है कि ज़िंदगी का असली मज़ा साथ बैठने, बातें करने और छोटी-छोटी खुशियाँ बाँटने में है। यहाँ लोग मुस्कुराकर मिलते हैं, और यही मुस्कान दिल को तसल्ली देती है।
वलीदपुर का बाज़ार सिर्फ एक बाज़ार नहीं, बल्कि एक याद है, एक अनुभव है और एक सबक भी। यह हमें सिखाता है कि सच्चा सुकून वहीं मिलता है जहाँ अपनापन और रिश्तों की खुशबू अब भी जिंदा है




