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चंदौली एशिया का सबसे बड़ा भेड़ प्रजनन केंद्र एक सुनहरा अवसर जो उपेक्षा की भेंट चढ़ गया, इससे हो सकता है जिले का नाम रोशन, ब्लैक राइस की तरह यह भी विलुप्त

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ब्यूरो रिपोर्ट रविशंकर मिश्रा

उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद का नौगढ़ क्षेत्र कभी एशिया के सबसे बड़े भेड़ प्रजनन केंद्र के रूप में जाना जाता था। वर्ष 1973 में स्थापित यह भेड़ा फार्म करीब लगभग 4700 कुछ एकड़ भूमि में फैला हुआ था, जो नौगढ़ से लेकर रिठिया, जरगर, बसौली, लालतापुर और भैसौड़ा बांध तक विस्तृत था। भैसौड़ा बांध भी विशेष रूप से इसी भेड़ा फार्म की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बनाया गया था। लेकिन आज यह गौरवशाली परियोजना सरकारी उपेक्षा और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी के कारण अपनी पहचान खोती जा रही है।

आज स्थिति यह है कि करीब 4700 एकड़ जमीन में केवल 1600 भेड़ और 200 सूकर ही शेष बचे हैं। इतने बड़े क्षेत्र में इतने कम पशुओं की संख्या इस बात का प्रमाण है कि यह योजना अपने उद्देश्य से भटक गई है। देखरेख के लिए मात्र दो चौकीदार रात में तैनात किए गए हैं, जो सुरक्षा और रखरखाव के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

लगभग 1600 भेड़

भेड़ा फार्म से जुड़ी संभावनाएं कभी अपार थीं। इससे न केवल पशुपालन को बढ़ावा मिल सकता था, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार, ऊन उद्योग का विकास, और कृषि के साथ एकीकृत आर्थिक मॉडल की स्थापना की जा सकती थी। लेकिन विभागीय लापरवाही, संसाधनों की कमी और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता ने इस परियोजना को गर्त में ढकेल दिया।

चंदौली एक कृषि प्रधान जिला है, जिसकी चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में ब्लैक राइस के संदर्भ में की थी। यहां के किसान मेहनती हैं, लेकिन उन्हें समय पर उचित मूल्य नहीं मिल पाता। यही कारण है कि जिले की प्रगति की गति थम सी गई है। और लोग ब्लैक राइस पर नहीं दे रहे थे

डॉक्टर जसवंत सिंह

भेड़ा फार्म के वर्तमान हालात पर डॉ. यशवंत सिंह, उप निदेशक पशुपालन विभाग, बताते हैं कि हर छह महीने में करीब 1600 से 1800 क्विंटल ऊन का उत्पादन होता है। इस ऊन को मिर्जापुर केंद्र भेजा जाता है, जहां इसकी नीलामी की जाती है। इससे आय तो होती है, लेकिन उसका अधिकतम लाभ स्थानीय क्षेत्र को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि ऊन प्रसंस्करण और विपणन की कोई स्थानीय व्यवस्था नहीं है।

अगर चंदौली के जनप्रतिनिधि और अधिकारी प्रारंभिक चरण में इस योजना को गंभीरता से लेते, तो यह फार्म जिले की आर्थिक रीढ़ बन सकता था। यहां पशुपालन, कृषि, हस्तशिल्प, ऊन उद्योग और पर्यटन का अद्भुत समन्वय हो सकता था। यह फार्म युवाओं के लिए स्वरोजगार और कौशल विकास का केंद्र बन सकता था, जिससे जिले का समग्र विकास संभव होता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि इस भेड़ा फार्म को पुनः सक्रिय किया जाए। सरकार को चाहिए कि वह एक विस्तृत पुनरुद्धार योजना बनाए, जिसमें आधुनिक पशुपालन तकनीकों, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग, और किसानों को सीधे जोड़ने की रणनीति हो।

यदि अब भी इसे नजरअंदाज किया गया, तो यह ऐतिहासिक योजना केवल एक नाम बनकर रह जाएगी—एक खोया हुआ अवसर, जिसकी कीमत चंदौली को वर्षों तक चुकानी पड़ेगी।

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