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चंदौली मासूम अंशिका की डूबने से दर्दनाक मौत,अधूरा रह गया राखी का सपना पोखरी बनी मौत का कुआं

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संवाददाता
विनोद कुमार यादव

नौगढ़, चंदौली।
रक्षाबंधन से पहले ठठवां गांव में उस वक्त कोहराम मच गया, जब चंचल मुस्कान वाली 8 वर्षीय अंशिका की पोखरी में डूबकर मौत हो गई। शनिवार दोपहर की यह घटना इतनी दिल दहला देने वाली थी कि पूरे गांव में मातम पसरा गया। जिस बच्ची के सपनों में भाई की कलाई पर राखी बांधने की तैयारी थी, वो अब एक सफेद कफ़न में लिपटी हुई है।

नहाते वक्त हुआ हादसा, गहराई ने छीनी मासूम की सांसें

मझगांई गांव निवासी राजेश राम की छोटी बेटी अंशिका अपनी बड़ी बहन सोनली और सहेलियों के साथ रोज़ की तरह गांव के पोखरे पर नहाने गई थी। किसी को क्या पता था कि यह उसका आखिरी स्नान होगा। जैसे ही वह फिसली, उसका मासूम शरीर गहराई में समा गया। सहेलियां और बहन चीखती रहीं, लेकिन अंशिका वापस नहीं आई।

चीख-पुकार सुन दौड़ा गांव, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी
सहेलियों के रोने-चिल्लाने की आवाज़ सुनकर गांव में हड़कंप मच गया। लोग दौड़कर पहुँचे, पर तब तक अंशिका की सांसे थम चुकी थीं। सूचना पाकर चकरघट्टा थाना प्रभारी मौके पर पहुँचे और पंचनामा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भिजवाया गया।

माँ की चीख से दहल उठा गांव, भाई का टूट गया सपना
माँ शारदा देवी जैसे ही बेटी की मौत की खबर सुनीं, बेसुध होकर ज़मीन पर गिर पड़ीं। “मेरी अंशिका… मेरी गुड़िया…” कहते हुए उनका विलाप गांव की रग-रग में सिहरन दौड़ा गया। वहीं भाई हिमांशु, जो रक्षाबंधन के दिन बहन की राखी का इंतज़ार कर रहा था, फूट-फूट कर रोने लगा। अंशिका ने ही कुछ दिन पहले कहा था— “भैया, इस बार तुम्हारी कलाई पर सबसे सुंदर राखी मैं ही बांधूंगी।” लेकिन अब वह राखी अधूरी रह गई।

छोटी उम्र में बड़े सपने: “मैं टीचर बनूंगी पापा”
चौथी कक्षा की छात्रा अंशिका पढ़ाई में तेज़ थी। मिट्टी के खिलौनों से खेलना, कॉपी में फूल बनाना, और मंदिर की घंटी बजाकर स्कूल जाना—उसकी दिनचर्या में मासूमियत और उजाला था। पिता से अकसर कहती, “पापा, मैं टीचर बनूंगी, सब बच्चों को पढ़ाऊंगी।” उसकी आंखों में सपने थे और आवाज़ में आत्मविश्वास। वही आंखें अब हमेशा के लिए बंद हो गईं।

वो हँसी, जो अब सिर्फ यादों में है…
गांव के बुज़ुर्ग कहते हैं—“इतनी प्यारी बच्ची, ऐसी मासूम मुस्कान, बहुत दिनों बाद देखी थी।” उसकी खिलखिलाहट से गलियाँ गूंजती थीं, अब वहीं गलियाँ सन्नाटे से भरी हैं। अंशिका चली गई, मगर उसकी मासूम यादें हर दिल में रह गईं।

अब प्रशासन से सवाल—कब होगी सुरक्षा की व्यवस्था?
ग्रामीणों का कहना है कि पोखरे की गहराई खतरनाक है, लेकिन आज तक कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं किए गए। क्या इसी तरह मासूम जानें जाती रहेंगी? क्या अब भी प्रशासन जागेगा?
अब सिर्फ राखी की नहीं, सुरक्षा की भी ज़रूरत है… ताकि कोई और अंशिका न छिने।

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